शुक्रवार, 11 मई 2018
On मई 11, 2018 by Kathak Krazzy No comments
मृणालिनी साराभाई की 100 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि
मशहूर शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई का आज 100वां जन्मदिन है। भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना थीं। उन्हें 'अम्मा' के तौर पर जाना जाता था। शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान तथा उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।
मृणालिनी साराभाई का परिचय
कथकली और भरतनाट्यम में माहिर पद्म पुरस्कार से सम्मानित मृणालिनी का जन्म 11 मई 1918 को केरल में हुआ था। उनके पिता डॉ. स्वामीनाथन मद्रास हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। मां अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता सेनानी थीं, जो बाद में देश की पहली संसद की सदस्य भी रही। मृणालिनी की बड़ी बहन लक्ष्मी सहगल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जानी जाती हैं। वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला सेना झांसी रेजीमेंट की कमांडर इन चीफ़ थीं।
मृणालिनी का बचपन स्विट्जरलैंड में बीता जहां उन्होंने 'डेलक्रूज स्कूल' से पश्चिमी डांस की बारिकियां सीखीं। फिर उन्होंने रबींद्रनाथ टैगोर की देख-रेख में शांति निकेतन में शिक्षा ग्रहण किया और यहीं से डांस उनकी जिंदगी बन गया। आज मृणालिनी साराभाई के जन्मशताब्दी पर बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें. ऑटोबायोग्राफी 'द वायस ऑफ हार्ट' में मृणालिनी ने बताया कि वह 5 साल की उम्र से ही डांसर बनना चाहती थीं। मृणालिनी ने छोटी उम्र में दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम और कथकली सीखना शुरू कर दिया था। 24 साल की उम्र में मृणालिनी साराभाई ने अपना हमसफर विक्रम साराभाई को चुना। विक्रम साराभाई जाने-माने वैज्ञानिक थे। उन्हें 'फादर ऑफ इंडिया स्पेस प्रोग्राम' कहा जाता है। विज्ञान में डांस या डांस में विज्ञान कहां से आया नहीं मालूम लेकिन दोनों ने जिंदगी साथ बिताने का फैसला किया। शादी के बाद मृणालिनी पति के साथ अहमदाबाद शिफ्ट हो गईं। 1948 में उन्होंने अहमदाबाद में दर्पण एकेडमी की स्थापना की। यही नहीं मृणालिनी ने 1949 में पेरिस में डांस किया था जो उस वक्त बहुत बड़ी बात थी। उन्होंने 18 हजार से अधिक छात्रों को भरतनाट्यम और कथकली में प्रशिक्षण दिया था। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी जानी-मानी शास्त्रीय नृत्यांगना हैं।
कथकली और भरतनाट्यम में माहिर पद्म पुरस्कार से सम्मानित मृणालिनी का जन्म 11 मई 1918 को केरल में हुआ था। उनके पिता डॉ. स्वामीनाथन मद्रास हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। मां अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता सेनानी थीं, जो बाद में देश की पहली संसद की सदस्य भी रही। मृणालिनी की बड़ी बहन लक्ष्मी सहगल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जानी जाती हैं। वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला सेना झांसी रेजीमेंट की कमांडर इन चीफ़ थीं।
मृणालिनी का बचपन स्विट्जरलैंड में बीता जहां उन्होंने 'डेलक्रूज स्कूल' से पश्चिमी डांस की बारिकियां सीखीं। फिर उन्होंने रबींद्रनाथ टैगोर की देख-रेख में शांति निकेतन में शिक्षा ग्रहण किया और यहीं से डांस उनकी जिंदगी बन गया। आज मृणालिनी साराभाई के जन्मशताब्दी पर बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें. ऑटोबायोग्राफी 'द वायस ऑफ हार्ट' में मृणालिनी ने बताया कि वह 5 साल की उम्र से ही डांसर बनना चाहती थीं। मृणालिनी ने छोटी उम्र में दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम और कथकली सीखना शुरू कर दिया था। 24 साल की उम्र में मृणालिनी साराभाई ने अपना हमसफर विक्रम साराभाई को चुना। विक्रम साराभाई जाने-माने वैज्ञानिक थे। उन्हें 'फादर ऑफ इंडिया स्पेस प्रोग्राम' कहा जाता है। विज्ञान में डांस या डांस में विज्ञान कहां से आया नहीं मालूम लेकिन दोनों ने जिंदगी साथ बिताने का फैसला किया। शादी के बाद मृणालिनी पति के साथ अहमदाबाद शिफ्ट हो गईं। 1948 में उन्होंने अहमदाबाद में दर्पण एकेडमी की स्थापना की। यही नहीं मृणालिनी ने 1949 में पेरिस में डांस किया था जो उस वक्त बहुत बड़ी बात थी। उन्होंने 18 हजार से अधिक छात्रों को भरतनाट्यम और कथकली में प्रशिक्षण दिया था। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी जानी-मानी शास्त्रीय नृत्यांगना हैं।
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| पति विक्रम सारा बाई के साथ |
मृणालिनी साराभाई का प्रशिक्षण
तत्कालीन समय में यह वह दौर, था जब कलाकार सिर्फ एक ‘फॉर्म नहीं सीखते थे। मृणालिनी साराभाई ने भी नृत्य की अलग-अलग शैलियों की बारीकियां सीखीं। उन्होंने अमूबी सिंह से मणिपुरी नृत्य सीखा। कुंजु कुरूप से कथकली सीखा। मीनाक्षी सुदंरम पिल्लै और मुथुकुमार पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा। उनके हर एक गुरू का अपनी अपनी कला में जबरदस्त योगदान था। इसी दौरान उन्होंने विश्वविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के भाई पंडित उदय शंकर के साथ भी काम किया। पंडित उदय शंकर का भारतीय कला को पूरी दुनिया में अलग पहचान दिलाने का श्रेय जाता है। उन्होंने आधुनिक नृत्य को लोकप्रियता और कामयाबी के अलग मुकाम पर पहुंचाया। इस बीच मृणालिनी साराभाई कुछ दिनों के लिए अमेरिका भी गईं और वहां जाकर ड्रामाटिक आर्ट्स की बारीकियां सीखीं। इसके बाद मृणालिनी साराभाई ने देश दुनिया में भारतीय नृत्य परंपरा का विकास किया। मृणालिनी साराभाई ने भारत लौटकर जानी-मानी नृत्यांगना मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया और फिर दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य और पौराणिक गुरु थाकाज़ी कुंचू कुरुप से कथकली के शास्त्रीय नृत्य-नाटक में प्रशिक्षण लिया।
तत्कालीन समय में यह वह दौर, था जब कलाकार सिर्फ एक ‘फॉर्म नहीं सीखते थे। मृणालिनी साराभाई ने भी नृत्य की अलग-अलग शैलियों की बारीकियां सीखीं। उन्होंने अमूबी सिंह से मणिपुरी नृत्य सीखा। कुंजु कुरूप से कथकली सीखा। मीनाक्षी सुदंरम पिल्लै और मुथुकुमार पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा। उनके हर एक गुरू का अपनी अपनी कला में जबरदस्त योगदान था। इसी दौरान उन्होंने विश्वविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के भाई पंडित उदय शंकर के साथ भी काम किया। पंडित उदय शंकर का भारतीय कला को पूरी दुनिया में अलग पहचान दिलाने का श्रेय जाता है। उन्होंने आधुनिक नृत्य को लोकप्रियता और कामयाबी के अलग मुकाम पर पहुंचाया। इस बीच मृणालिनी साराभाई कुछ दिनों के लिए अमेरिका भी गईं और वहां जाकर ड्रामाटिक आर्ट्स की बारीकियां सीखीं। इसके बाद मृणालिनी साराभाई ने देश दुनिया में भारतीय नृत्य परंपरा का विकास किया। मृणालिनी साराभाई ने भारत लौटकर जानी-मानी नृत्यांगना मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया और फिर दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य और पौराणिक गुरु थाकाज़ी कुंचू कुरुप से कथकली के शास्त्रीय नृत्य-नाटक में प्रशिक्षण लिया।
मृणालिनी साराभाई को प्राप्त पुरस्कार व सम्मान
भारत सरकार की ओर से मृणालिनी साराभाई को देश के प्रसिद्ध नागरिक सम्मान 1965 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण और फिर भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मृणालिनी देश में जितनी मशहूर थीं उतना ही उन्होंने विदेश में भी नाम कमाया। खासतौर पर फ्रांस में तमाम दिग्गजों ने उनकी वाहवाही की। 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया', नॉविच यूके ने भी उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी थी। 'इंटरनेशनल डांस काउंसिल पेरिस' की ओर से उन्हें एग्जीक्यूटिव कमेटी के लिए भी नामित किया गया था। प्रसिद्ध 'दर्पणा एकेडमी' की स्थापना मृणालिनी साराभाई ने की थी।
21 जनवरी 2016 को मृणालिनी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भले ही मृणालिनी साराभाई दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अपने नृत्य की दुनिया से बहुत कुछ दिया। आज उनकी बेटी मल्लिका साराभाई और बेट कार्तिकेय इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
भारत सरकार की ओर से मृणालिनी साराभाई को देश के प्रसिद्ध नागरिक सम्मान 1965 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण और फिर भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मृणालिनी देश में जितनी मशहूर थीं उतना ही उन्होंने विदेश में भी नाम कमाया। खासतौर पर फ्रांस में तमाम दिग्गजों ने उनकी वाहवाही की। 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया', नॉविच यूके ने भी उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी थी। 'इंटरनेशनल डांस काउंसिल पेरिस' की ओर से उन्हें एग्जीक्यूटिव कमेटी के लिए भी नामित किया गया था। प्रसिद्ध 'दर्पणा एकेडमी' की स्थापना मृणालिनी साराभाई ने की थी।
21 जनवरी 2016 को मृणालिनी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भले ही मृणालिनी साराभाई दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अपने नृत्य की दुनिया से बहुत कुछ दिया। आज उनकी बेटी मल्लिका साराभाई और बेट कार्तिकेय इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
गूगल ने शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई को उनकी 100वीं जयंती पर डूडल के जरिये श्रद्धांजलिदी।
भारत की प्रसिद्ध नृत्यांगना और पद्म भूषण से सम्मानित मृणालिनी साराभाई का 11 मई, 2018 को 100वाँ जन्म दिवस है। महान नृत्यांगना को इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर श्रद्धांजलि दी। इस गूगल डूडल को सुदीप्ति टकर ने बनाया। मृणालिनी साराभाई गूगल डूडल में दर्पण अकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट के ऑडिटॉरियम में एक छतरी लिए हुए खड़ी नजर आ रही हैं। हैं और उनके पीछे उनकी तीन छात्राएं परफॉर्म करती नजर आ रही हैं। गूगल ने एक पोस्ट में डूडल के बारे में लिखा, "आज के डूडल में भारतीय क्लासिकल डांसर मृणालिनी साराभाई को याद किया जा रहा है, जिन्होंने कम उम्र में ही अपनी टेक्नीक, ऊर्जा और मजबूती के दम पर भरतनाट्यम की साउथ इंडियन क्लासिकल डांस फॉर्म और कथकली की क्लासिकल डांस ड्रामा की ट्रेनिंग ली।'
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संतोष साँवरिया
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